" We can not justify one wrong with another one. After Godhara, there were constitutional and legal options available to bring the culprits to the justice. If State Government became accomplice in communal retaliation, then it was a more heinous crime against the Constitution & Humanity." - Putul
Sunday, November 3, 2013
कल दिवाली है
-पुतुल
बैंगलौर के ट्रैफिक जाम में,
रोड के किनारे फटेहाल बैठा,
व्यंगमयी घूरती आँखें,
करोड़ों-अरबों फूंके जा रहे -
पटाखे, फूलझड़ियों में,
उसके हिस्से की रोटी,
दो पल की चैनभरी नींद,
मुहैया करा सकता है -
गैर जिम्मेवार मस्ती पर लगाम ,
आदमी से आदमी की हमदर्दी...........
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बैंगलौर के ट्रैफिक जाम में,
रोड के किनारे फटेहाल बैठा,
व्यंगमयी घूरती आँखें,
करोड़ों-अरबों फूंके जा रहे -
पटाखे, फूलझड़ियों में,
उसके हिस्से की रोटी,
दो पल की चैनभरी नींद,
मुहैया करा सकता है -
गैर जिम्मेवार मस्ती पर लगाम ,
आदमी से आदमी की हमदर्दी...........
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बेटियाँ जान होती हैं
" बेटियाँ जान होती हैं, जिगर के टुकड़े होती हैं, आँखों की तारा होती हैं , खानदान की इज्जत होती हैं इत्यादि ,अपनी माता-पिता और भाइयों के लिए, तो फिर भारतीय संविधान द्वारा बेटियों का पैतृक अचल सम्पदा में बराबरी की हिस्सेदारी देने में भी माता-पिता और भाइयों को उदारता और न्यायसंगत पहल करनी चाहिए. यह बेटियों का संवैधानिक आधिकार है, न कि कोई भीख या दया. सभ्य समाज को इस विषय पर उदाहरण पेश करना होगा, जनांदोलन करना होगा, बेटियों का इस अधिकार से महरूम करने वाले तथाकथित भावनात्मक चोचलेबाजी और दहेज़ के रूप के दाना डालने वाले हथकंडों को बेनकाब करना होगा. अगर बेटियों को उनका यह संवैधानिक अधिकार मिलता है, तो बहुत हद तक महिला स्मिता, सुरक्षा और साख सशक्त होगी और बेटियों को दहेज़ और अन्य उत्पीड़न से मुक्ति मिल पायेगी. साथ ही साथ कन्या भ्रूण हत्या पर भी समाज का कठोर निर्दयी दिल पिघलेगा. बेटियों को खास करके अपनी इस लड़ाई को लड़ना पड़ेगा. अगर यह बात पारिवारिक शांति और समझ से ही मूर्तरूप लेले तो बढ़िया है, अपितु इस सामाजिक सुधार के लिए गंभीरता के साथ के लोकतान्त्रिक लड़ाई लड़नी पड़ेगी, सरकार और सामाजिक संस्थाओं को इस संवेदनशील मुद्दे पर बेटियों को भरपूर सहायता और मार्गदर्शन देना पड़ेगा, तब ही कहीं जा कर वास्तविक ढंग से बेटियों को परिवार और समाज में बराबरी और सम्मान का दर्जा मिल पायेगा. मेरी इन विचारों से हो सकता है, बहुत लोग असहमत हो, लेकिन यह भारतीय संविधान का एक क्रन्तिकारी प्रावधान है, हम हरेक तरह के भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं, तो फिर परिवार में हो रहे इस अमानवीय और जघन्य भ्रष्टाचार की खिलाफत क्यों नहीं , कभी भी दो मापदंड स्वीकार्य नहीं होने चाहिए." - -पुतुल
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